1 September 2026

4 साल बाद कोर्ट के आदेश पर दर्ज होगी FIR, अधिवक्ता शिवा वर्मा के प्रयासों से पीड़ित परिवार को मिली न्याय की उम्मीद

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चार वर्षों तक पुलिस द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज न किए जाने के मामले में न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए संबंधित पुलिस को तत्काल मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। मामला सड़क दुर्घटना के बाद कथित लापरवाहीपूर्ण इलाज से हुई एक युवक की मौत से जुड़ा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के सतपुरा निवासी मैनपाल पुत्र अतर सिंह के पुत्र गौरव कुमार का 3 जुलाई 2022 को सड़क हादसा हो गया था। घायल गौरव को उपचार के लिए देहरादून स्थित रिस्पना पुल के पास प्रसाद मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने समय पर ऑपरेशन नहीं किया और कई घंटे की देरी के बाद भी प्राथमिकता उस गंभीर चोट को नहीं दी, जिससे मरीज की जान को सबसे अधिक खतरा था।

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परिजनों का यह भी आरोप है कि 5 जुलाई 2022 को जब उन्होंने मरीज को बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पताल ले जाने की बात कही तो अस्पताल प्रबंधन ने आपत्ति जताई। बाद में 8 जुलाई 2022 को दूसरे अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने गौरव को मृत घोषित कर दिया।

मृतक के पिता ने 24 सितंबर 2022 को पुलिस चौकी में शिकायत देने का प्रयास किया, लेकिन आरोप है कि शिकायत स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) देहरादून को प्रार्थना पत्र दिया। मामले की जांच क्षेत्राधिकारी, नेहरू कॉलोनी को सौंपी गई और बाद में मुख्य चिकित्सा अधिकारी, देहरादून द्वारा गठित जांच समिति को भी जांच के लिए भेजा गया।

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शिकायत के अनुसार जांच में अस्पताल संचालन और चिकित्सकीय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर तथ्य सामने आए। इसके बावजूद पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया। पीड़ित परिवार ने वर्ष 2024 और 2025 में भी कई बार पुलिस अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

आखिरकार पीड़ित पक्ष की ओर से अधिवक्ता शिवा वर्मा ने न्यायालय में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। न्यायालय के समक्ष यह भी बताया गया कि उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल द्वारा संबंधित डॉक्टरों के विरुद्ध निर्णय दिया जा चुका है और गलत उपचार के कारण युवक की मौत होने के आरोप हैं।

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दोनों पक्षों को सुनने और उपलब्ध दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने संबंधित पुलिस को दोषियों के विरुद्ध उपयुक्त धाराओं में तत्काल FIR दर्ज करने तथा की गई कार्रवाई से न्यायालय को अवगत कराने के निर्देश दिए हैं।

«नोट: मामले में लगाए गए आरोप शिकायतकर्ता के पक्ष और न्यायालय में प्रस्तुत अभिलेखों पर आधारित हैं। आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।»

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