13 October 2026

केदारनाथ में ‘VIP कल्चर’ पर बवाल: क्या मुख्यमंत्री के आदेशों से ऊपर हैं मंदिर समिति के अध्यक्ष?

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केदारनाथ धाम:

उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चार धाम यात्रा अपनी भक्ति और आस्था के लिए जानी जाती है, लेकिन हाल के दिनों में यह ‘वीआईपी कल्चर’ के कारण विवादों के घेरे में है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने प्रशासन और श्री बद्री-केदार मंदिर समिति (BKTC) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीर्थ पुरोहितों का आक्रोश: “बैक डोर एंट्री” पर सवाल

वायरल वीडियो में केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित और पंडा समाज, मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी (वीडियो के संदर्भ में हेमंत द्विवेदी के नाम से विरोध) के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते नजर आ रहे हैं। पुरोहितों का सीधा आरोप है कि मंदिर समिति के प्रभावशाली लोग ‘वीआईपी’ श्रद्धालुओं को पिछले दरवाजे (बैक डोर) से दर्शन करवा रहे हैं, जबकि आम श्रद्धालु घंटों लंबी लाइनों में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

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वीडियो में “वीआईपी कल्चर बंद करो” और “हेमंत द्विवेदी मुर्दाबाद” जैसे नारों की गूँज साफ सुनी जा सकती है। तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि यह न केवल बाबा केदार के प्रति अपमान है, बल्कि उन हजारों भक्तों के साथ भी अन्याय है जो दूर-दराज से आस्था लेकर यहाँ पहुँचते हैं।

क्या मुख्यमंत्री से भी बड़े हो गए हैं मंदिर समिति के अध्यक्ष?

इस विवाद ने एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़ा कर दिया है। गौरतलब है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं एक मिसाल पेश करते हुए केदारनाथ धाम में वीआईपी दर्शन नहीं किए थे। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि धाम में सभी श्रद्धालु समान हैं और किसी भी प्रकार का वीआईपी प्रोटोकॉल आम यात्रियों की सुविधा में बाधा नहीं बनना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि, जब सूबे के मुख्यमंत्री आम नागरिक की तरह दर्शन कर सकते हैं, तो मंदिर समिति के संरक्षण में यह वीआईपी संस्कृति क्यों फल-फूल रही है?

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क्या श्री बद्री-केदार मंदिर समिति के पदाधिकारी मुख्यमंत्री के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं?

क्या प्रशासन ‘बैक डोर एंट्री’ कराने वाले रसूखदारों पर लगाम कसने में नाकाम साबित हो रहा है?

आस्था के केंद्र में भेदभाव क्यों?

केदारनाथ की पहाड़ियों के बीच जहाँ हर भक्त ‘बम-बम भोले’ के जयकारों के साथ अपनी बारी की प्रतीक्षा करता है, वहाँ इस तरह का भेदभाव आस्था को ठेस पहुँचाता है। प्रदर्शनकारी पुरोहितों का तर्क है कि वीआईपी दर्शन के कारण आम श्रद्धालुओं की लाइन रोक दी जाती है, जिससे अव्यवस्था फैलती है और बुजुर्ग व बीमार यात्रियों को भारी कष्ट झेलना पड़ता है।

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चार धाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था और पहचान का आधार है। यदि मंदिर समितियों और प्रशासन ने समय रहते इस ‘वीआईपी मोह’ को नहीं त्यागा, तो यह विवाद सरकार की छवि और यात्रा की शुचिता पर भारी पड़ सकता है। जनता अब जवाब मांग रही है कि क्या केदारनाथ के दरबार में भी अब ‘खास’ और ‘आम’ की अलग-अलग पहचान होगी?

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