13 October 2026

आस्था के केंद्र में ‘अपनों’ पर मेहरबानी, उपाध्यक्ष ने पत्नी को ही बना डाला अपना चपरासी!

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देहरादून/रुद्रप्रयाग:

 

विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ और केदारनाथ धामों की व्यवस्था संभालने वाली श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। करोड़ों सनातनी हिंदुओं की आस्था के इस केंद्र में श्रद्धालुओं के दान के पैसे का किस कदर दुरुपयोग हो रहा है, इसका खुलासा RTI (सूचना के अधिकार) से हुआ है।

BKTC के उपाध्यक्ष और दर्जाधारी राज्यमंत्री विजय कपरूवाण पर गंभीर आरोप लगे हैं कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर अपनी ही पत्नी को अपना अनुचर (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) नियुक्त कर दिया और मंदिर समिति के कोष से वेतन का भुगतान कराया।

RTI में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी द्वारा आरटीआई के माध्यम से निकाली गई जानकारी में भ्रष्टाचार के कई परतें खुली हैं:

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पत्नी को बनाया ‘चपरासी’: शासन के नियमों के अनुसार, दायित्वधारी को सरकारी कार्मिक न मिलने पर निजी स्तर पर स्टाफ रखने की छूट है। आरोप है कि उपाध्यक्ष विजय कपरूवाण ने अपनी पत्नी श्रीमती गंगा देवी को ही अपना ‘अनुचर’ नियुक्त कर दिया और उन्हें ₹12,000 प्रतिमाह वेतन का भुगतान कराया जा रहा है।

निजी सहायक भी ‘खास’: केवल पत्नी ही नहीं, बल्कि अपने ही पड़ोस के एक युवक प्रियांशू सिंह को ₹15,000 प्रतिमाह पर वैयक्तिक सहायक (PA) के रूप में तैनात किया गया है।

दोहरी सुविधाओं का खेल: BKTC का मुख्यालय जोशीमठ और कैंप कार्यालय देहरादून में है, जहाँ उपाध्यक्ष के लिए कक्ष आवंटित है। इसके बावजूद, कपरूवाण ने अपने गृह नगर रुद्रप्रयाग में निजी कार्यालय और आवास दर्शाकर ₹25,000 प्रतिमाह का आवासीय भत्ता डकारा।

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श्रद्धालुओं के दान से खरीदा गया फर्नीचर

आरटीआई से प्राप्त बिलों के अनुसार, रुद्रप्रयाग स्थित उनके निजी कार्यालय के लिए फर्नीचर की खरीद भी मंदिर समिति के बजट (सज्जा मद) से की गई। दस्तावेजों के मुताबिक, जून 2025 में इसके लिए लगभग ₹43,700 का भुगतान किया गया। साथ ही, उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे दो वाहनों (बोलेरो और अन्य) के डीजल, बीमा और सर्विसिंग का लाखों का खर्च भी BKTC वहन कर रही है।

नैतिकता और नियमों की धज्जियाँ

अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी का कहना है कि:

“BKTC जैसी पवित्र संस्था को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया है। जब समिति के पास पहले से ही पर्याप्त कर्मचारी हैं, तो निजी नियुक्तियां क्यों की गईं? और सबसे शर्मनाक बात यह है कि एक दर्जाधारी मंत्री ने नैतिकता को ताक पर रखकर अपनी पत्नी को ही वेतनभोगी कर्मचारी बना दिया।”

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जांच की मांग

यह मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि जो पैसा धामों के विकास और यात्री सुविधाओं पर खर्च होना चाहिए था, वह पदाधिकारियों के निजी ऐशो-आराम और परिवारवाद की भेंट चढ़ रहा है। RTI कार्यकर्ता ने प्रदेश सरकार से इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच करने और दोषी पदाधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।

बड़ा सवाल: क्या सरकार धर्म और आस्था के नाम पर चल रहे इस ‘पारिवारिक रोजगार मेले’ पर लगाम लगाएगी?

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