वन नेशन, वन इलेक्शन क्या होने जा रहा है लागू! क्या है सरकार का पूरा प्लान, क्या हैं इसके फायदे-नुकसान?
नई दिल्ली
भारत के चुनावी इतिहास और लोकतांत्रिक ढांचे में एक बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने देश में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (एक देश, एक चुनाव) के प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी दे दी है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित विशेष समिति (कोविंद पैनल) की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए सरकार अब इसे जमीन पर उतारने की तैयारी में है।
लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस व्यवस्था की वकालत करते आ रहे हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया क्या है, इसे कैसे लागू किया जाएगा, और इस पर क्या विवाद चल रहा है।
क्या है ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’?
वर्तमान व्यवस्था में देश के किसी न किसी हिस्से में हर कुछ महीनों में चुनाव होते रहते हैं। लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव और फिर स्थानीय निकायों (नगर निगम, पंचायत) के चुनाव का सिलसिला चलता रहता है। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का सीधा मतलब है कि पूरे देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं।
दो चरणों (Phases) में लागू करने का प्लान
कोविंद पैनल की सिफारिशों के मुताबिक, इस महा-योजना को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव है:
पहला चरण: सबसे पहले लोकसभा और देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ (साइमलटेनियस) कराए जाएंगे।
दूसरा चरण: लोकसभा और विधानसभा चुनाव संपन्न होने के अगले 100 दिनों के भीतर देश के सभी स्थानीय निकायों (नगर पालिकाओं और पंचायतों) के चुनाव कराए जाएंगे।
इसके साथ ही, पूरे देश के मतदाताओं के लिए एक ‘कॉमन इलेक्टोरल रोल’ (साझा मतदाता सूची) तैयार की जाएगी, ताकि मतदाताओं को अलग-अलग स्तर के चुनावों के लिए अलग-अलग सूचियों में नाम न ढूंढना पड़े।
ट्रांजिशन फेज: अगर बीच में सरकार गिर गई तो क्या होगा?
इस योजना को लेकर आम जनता और विश्लेषकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई राज्य सरकार या केंद्र सरकार 5 साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही गिर जाए (बहुमत खो दे), तो क्या होगा?
नए प्रस्तावित नियमों के अनुसार:
यदि 2029 में एक साथ चुनाव होते हैं और 2030 में किसी राज्य की सरकार गिर जाती है, तो वहां नए चुनाव तो होंगे, लेकिन नई सरकार पूरे 5 साल के लिए नहीं बनेगी।
वह सरकार केवल ‘बचे हुए कार्यकाल’ (रिमेनिंग टर्म) के लिए ही काम करेगी (यानी 2034 तक के लिए)। इसके बाद 2034 में दोबारा पूरे देश के साथ वहां भी चुनाव होंगे।
माना जा रहा है कि इस नियम से राजनीतिक अस्थिरता कम होगी और विधायकों-सांसदों द्वारा पाला बदलने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।
2024 से 2028 के बीच जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनका कार्यकाल भी 2029 के आम चुनावों के साथ सिंक (मर्ज) करने के लिए छोटा या व्यवस्थित किया जा सकता है।
संविधान में करने होंगे बड़े बदलाव
इस व्यवस्था को कानूनी अमलीजामा पहनाने के लिए संविधान में करीब 18 संशोधन करने पड़ सकते हैं। सरकार को दो मुख्य संशोधन बिल लाने होंगे:
पहला बिल (आर्टिकल 82A): यह एक साथ चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया और समय-सीमा को तय करेगा। इसे संसद से पास कराना होगा।
दूसरा बिल (आर्टिकल 324A): इसके तहत केंद्र सरकार को स्थानीय निकाय (पंचायत और नगरपालिका) चुनावों को भी इस टाइमलाइन से जोड़ने की शक्ति मिलेगी। चूंकि स्थानीय निकाय राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए इस संशोधन के लिए संसद के साथ-साथ कम से कम 50% राज्य विधानसभाओं की मंजूरी (सहमति) भी अनिवार्य होगी।
वन नेशन, वन इलेक्शन के पक्ष में तर्क (फायदे)
पॉलिसी पैरालिसिस से मुक्ति (बेहतर गवर्नेंस): बार-बार चुनाव होने से देश में बार-बार ‘आचार संहिता’ लागू होती है, जिससे विकास कार्य और नीतियां ठप हो जाती हैं। एक बार चुनाव होने से सरकारें 5 साल तक बिना किसी चुनावी दवाब के सिर्फ काम पर ध्यान दे सकेंगी।
आर्थिक बोझ में भारी कमी: चुनाव कराने में निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों द्वारा हजारों-लाखों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। एक साथ चुनाव होने से इस भारी-भरकम खर्च पर लगाम लगेगी।
सप्लाई चेन और उत्पादकता में सुधार: बार-बार चुनावों के कारण सुरक्षा बलों की तैनाती, सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी और बार-बार होने वाली छुट्टियों से प्रशासनिक और औद्योगिक काम प्रभावित होते हैं, जो अब रुकेंगे।
वोटर टर्नआउट में बढ़ोतरी: मतदाताओं को बार-बार पोलिंग बूथ तक जाने की थकावट से राहत मिलेगी, जिससे मतदान का प्रतिशत सुधरने की उम्मीद है।
विरोध में तर्क और चुनौतियां (नुकसान)
क्षेत्रीय मुद्दों की अनदेखी: विपक्ष का तर्क है कि एक साथ चुनाव होने पर ‘राष्ट्रीय मुद्दे’ हावी हो जाएंगे और राज्यों के स्थानीय व क्षेत्रीय मुद्दे दब जाएंगे।
फेडरलिज्म (संघवाद) पर चोट: कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि यह व्यवस्था देश के लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के खिलाफ है। राज्यों की स्वायत्तता और उनकी राजनीतिक टाइमलाइन को केंद्र के अनुसार मोड़ना सही नहीं है।
वोटर का व्यवहार: अक्सर देखा गया है कि देश और राज्य के चुनाव में मतदाता अलग-अलग पार्टियों को चुनते हैं (जैसे दिल्ली में लोकसभा में भाजपा और विधानसभा में आम आदमी पार्टी)। एक साथ चुनाव होने पर मतदाता भ्रमित हो सकते हैं या किसी लहर में एक ही तरफ एकतरफा वोटिंग हो सकती है।
आगे की राह
कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार अब एक ‘इंप्लीमेंटेशन ग्रुप’ (क्रियान्वयन समूह) बनाएगी। केंद्रीय मंत्रियों के अनुसार, देश के करीब 80% हितधारकों ने इस कदम का समर्थन किया है, लेकिन जो राजनीतिक दल अभी इसके विरोध में हैं, सरकार उनसे भी आम सहमति बनाने का प्रयास करेगी। देश के लोकतांत्रिक इतिहास के इस सबसे बड़े बदलाव पर संसद के आगामी सत्रों में तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
